Haridwar( हरिद्वार )

The best places in Haridwar to visit

हरिद्वार राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और जिले की सूची में भी सबसे बड़ा है। यह शहर शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में स्थित है। हरिद्वार हिंदुओं के लिए एक पवित्र स्थान माना जाता है। आयोजनो में सबसे महत्वपूर्ण कुंभ मेला है, जो हर 12 साल में हरिद्वार में मनाया जाता है। हरिद्वार कुंभ मेले के दौरान लगभग लाखों तीर्थयात्री, भक्त और पर्यटक मोक्ष प्राप्त करने के लिए अपने पापों को धोने के लिए गंगा के तट पर दिव्य स्नान के लिए हरिद्वार आते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज चार स्थल हैं जहां इंद्र (स्वर्ग के राजा) और बाली (असुरो के राजा) के बीच लड़ाई के दौरान अमृत की बूंदें गलती से कुंभ (घड़े या कलश) से गिर गईं। ब्रह्म-कुंड वह स्थान है जहां अमृत की बुँदे गिरी थी और यह हर की पौड़ी में स्थित है, इसे हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट भी माना जाता है। यह आसपास के क्षेत्र में कांवर तीर्थ का एक प्राथमिक केंद्र भी है। जहां हजारों प्रतिभागी सैकड़ो किलोमीटर की यात्रा करके, गंगा से पवित्र जल इकट्ठा करते हैं और इसे अपने घर या अपने नजदीकी मंदिर के शिवलिंग पर चढ़ाते हैं।
पवित्र ग्रंथों में हरिद्वार का अलग-अलग नामों से उल्लेख किया गया है जैसे कपिलस्थान, गंगाद्वार और मायापुरी। यह छोटा चार धाम यात्रा (केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) की ओर पहला बिंदु भी है। शिव भक्त शहर को हरद्वार कहते हैं और विष्णु भक्त शहर को हरिद्वार कहते हैं क्योंकि हर का अर्थ शिव और हरि का अर्थ विष्णु है।

हर की पौड़ी, माया देवी मंदिर, मनसा देवी मंदिर, चंडी देवी मंदिर और कनखल यह 5 हरिद्वार के सबसे प्रसिद्ध स्थान है, इन्हें पंच तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है।

Har ki Pauri ( हर की पौड़ी )

Har ki pauri night

हर की पौड़ी का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई भरथरी की याद में करवाया था। ऐसा माना जाता है कि भरथरी ने हरिद्वार आकर गंगा के तट पर तपस्या की थी। जब उनकी मृत्यु हुई, तो उनके भाई ने उनके नाम पर एक घाट का निर्माण किया, जिसे बाद में हर की पौड़ी के नाम से जाना जाने लगा। हर की पौड़ी में सबसे दिव्य घाट ब्रह्मकुंड है। भ्रामकुंड, हर की पौड़ी में शाम की प्रार्थना (आरती) में उपस्थिति एक दिव्य अनुभव होता है। यह वह स्थान है जहां कांवड़ तीर्थयात्री गंगा जल लेने आते हैं। कुंभ मेले में लाखों संत, पुजारी और भक्त, दैवीय स्नान तिथियों पर मुख्य रूप से ब्रह्मकुंड में स्नान करते हैं।

Maya Devi Temple ( माया देवी मंदिर )

देवी माया हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी हैं। वह तीन सिर वाली और चार भुजाओं वाली देवी हैं जो देवी शक्ति का एक रूप है। देवी माया के सम्मान में ही हरिद्वार को पहले मायापुरी के नाम से जाना जाता था। यह मंदिर एक सिद्ध पीठ है और यह हरिद्वार में स्थित ऐसे तीन सिद्ध पीठों में से एक है, अन्य दो चंडी देवी मंदिर और मनसा देवी मंदिर हैं। यह हरिद्वार के तीन प्राचीन मंदिरों में से एक है जो अभी भी बरकरार है, अन्य दो नारायण-शिला और भैरव मंदिर हैं। माया देवी मंदिर में देवी माया की , देवी काली की और देवी कामाख्या की मूर्तियाँ (चिह्न) हैं। मंदिर हरिद्वार के स्टेशन के बहुत ही पास है पैदल चल कर भी पहुँचा जा सकता है।

Mansa Devi Temple ( मनसा देवी मंदिर )

Mansa Devi Temple

मनसा देवी मंदिर एक सिद्धपीठ है। यह मंदिर बिल्व पर्वत के शीर्ष पर स्थित है, जो हिमालय की सबसे दक्षिणी पर्वत श्रृंखला है। मनसा देवी का शाब्दिक अर्थ ‘इच्छाओं को पूरा करने वाली देवी है’। देवी मनसा को देवी शक्ति का एक रूप माना जाता है, जिनकी उत्पति ‘ भगवान शिव ’ के मन से हुई थी और मनसा देवी को नाग वासुकी (भगवन शिव के गले में विराजमान) की बहन माना जाता है। ऐसा कहा गया है कि नाग वासुकि को एक बहन के होने की इच्छा हुयी, जिसके पश्चात् उन्होंने भगवान शिव से एक बहन रूपी कन्या की इच्छा प्रकट करी, तब भगवान शिव ने उनकी इच्छा पूर्ति के लिये मनसा देवी को उत्पन किया। मनसा देवी का यह स्थान हरिद्वार में स्थित तीन सिद्धपीठ में से एक है (अन्य दो चंडी देवी मंदिर और माया देवी मंदिर)। मंदिर के मुख्य भाग में देवी की दो प्रभावशाली मूर्तियाँ हैं – एक तीन मुख और पाँच भुजाओं वाली और दूसरी आठ भुजाओं वाली। यह हरिद्वार के पंच तीर्थ में से एक है।

इसके बारे में एक लोक कथा है, एक बार मनसा, एक आम लड़की, जो अपने अभिभावकों से अपनी पूरी सच्चाई से अनजान थी, ने भगवान शिव से मिलने और उससे उसकी सच्चाई के बारे में पूछने का फैसला किया। भगवान शिव से मिलने के लिए, वह साधना के लिए बैठी और वर्षों के आध्यात्मिक अभ्यास के बाद, उन्हें भगवान शिव से मिलने और उनसे अपनी सच्चाई स्पष्ट करने का सौभाग्य मिला। अपने सत्य को जानने के बाद, उसने दुनिया के लिए कल्याण के लिये दैवीय शक्तियों को प्राप्त किया। मनसा देवी से अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए प्रार्थना करने वाले भक्त मंदिर में स्थित एक पेड़ की शाखाओं में धागे बांधते हैं। एक बार जब उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है, तो लोग पेड़ से धागा खोलने के लिए फिर से मंदिर आते हैं। देवी मनसा को प्रार्थना के लिए नारियल, फल, माला और अगरबत्ती भी अर्पित की जाती है।

Mansa Devi view point

मनसा देवी मंदिर तीर्थस्थल होने के साथ साथ एक पर्यटन स्थल भी है, खासकर पहाड़ी पर लगे उड़न खटोले (ट्रॉली , रोपवे) के कारण जो हरिद्वार शहर के सुंदर दृश्य को प्रस्तुत करता है। कोई भी इस मंदिर में ट्रॉली (रोपवे) से जा सकता है या पहाड़ी पर ट्रेक कर सकता है।

Chandi Devi Temple ( चंडी देवी मंदिर )

Chandi Devi Gate

यह मंदिर उत्तर भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है और जैसा कि नाम से ही पता चलता है। यह मंदिर माता चंडी देवी के बारे में है और गंगा नदी के पूर्व की ओर नील पर्वत पर स्थित है।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार इंद्र देव  के राज्य क्षेत्र स्वर्ग पर शुंभ और निशुंभ नामक दो राक्षसों ने कब्जा कर लिया था, देवताओं ने देवी पार्वती से रक्षा करने के लिये प्रार्थना की और फिर देवी पार्वती द्वारा ही एक शक्तिशाली देवी की उत्पत्ति हुई । क्यूंकि वह बहुत ही सुंदर और गतिशील देवी थी तो राक्षस राजा शुंभ उनसे शादी करना चाहते थे जब उन्होंने मना किया तो राजा ने उन्हें मारने के लिए चंदा और मुंडा को भेजा और वे दोनों कालिका देवी द्वारा मारे गये, जो चंडिका देवी के क्रोध से उत्पन हुई थीं।

जब उनके सभी प्रयास विफल हो गए तो दानव राजाओं ने स्वयं चंडिका देवी को मारने की कोशिश की, लेकिन बदले में देवी ने उन्हें ही मार डाला और युद्ध में विजयी होने के बाद उन्होंने कुछ देर नील पर्वत पर विश्राम किया। जिस स्थान पर विश्राम किया था, ऐसा माना जाता है कि उस स्थान पर ही मुख्य मूर्ति विराजमान है और वह मूर्ति आदि शंकराचार्य जी द्वारा 8वीं शताब्दी ईस्वी में स्थापित की गई थी और मंदिर का निर्माण 1929 ई. में कश्मीर के राजा सुचेत सिंह ने करवाया था।

View from Chandi Devi

मंदिर एक बहुत प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है और साल भर भक्तों का आना जाना लगा रहता  है, दो तरह से मंदिर पहुंचा जा सकता है।

पहला सबसे आसान उड़न खटोले (ट्रॉली , रोपवे) के माध्यम से जाना और दूसरा 4 -5 km  का  ट्रेक कर के जाना, और ट्रेक कर के जाने के भी दो रस्ते है दोनों ही खड़ी चढ़ाई वाले तो है ही, पर एक ट्रेक के रस्ते से दो पहिया वाहन से भी पहुंचा जा सकता है। रोपवे और ट्रेक दोनों के ही रस्ते स्टेशन से 5 किमी की दूरी पर चंडी घाट की तरफ है।

Kankhal ( कनखल )

कनखल हरिद्वार का सबसे प्राचीन स्थान है और हरिद्वार की उपनगरी के रूप में जाना जाता है। और यह शहर में स्थित दक्षेश्वर महादेव मंदिर के प्राचीन मंदिर के लिए सबसे अधिक जाना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह शहर राजा दक्ष के राज्य की राजधानी थी और इस जगह ही राजा दक्ष ने प्रसिद्ध यज्ञ किया था। दक्ष की पुत्री देवी सती थी , देवी सती ने अपने पिता द्वारा भगवान शिव को महायज्ञ में निमंत्रण न देकर उनका अपमान करने पर खुद को अग्नि से आत्म-दाह कर लिया था।
माता सती के अग्निदाह के बाद शिव जी अति क्रोधित हुये और उनके गण वीरभद्र ने राजा दक्ष का गला काट कर वध किया था। बाद में शिवजी ने उनके धड़ को बकरे के सिर से जोड़ दिया था। इसी घटना की याद में यहां पर यह दक्षेश्वर मदिर बना हुआ है और पास में ही एक स्थान सती कुंड भी है।
आज भी कनखल में बहुत सारे प्राचीन मंदिर बने हुए है, यह स्थान हरिद्वार के भीतर ‘पंच तीर्थ’ में से एक है।

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